रोहतासगढ़ किले के रोपवे का मार्ग हुआ प्रशस्त, मिली 1.33 हेक्टेयर भूमि

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रोहतासगढ़ किला, फोटो- आशीष कौशिक

जिले के ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला में पर्यटकों के पहुंचने के लिए रोप-वे निर्माण को अब वन विभाग ने जमीन मुहैया करा दी है। वन विभाग ने इसके लिए जिला प्रशासन को 1.33 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध करा दी है। पर्यटन के लिहाज से यह जिला के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। जहां रोप-वे के निर्माण की बाट जोह रहे जिलेवासियों के लिए यह एक अच्छी सूचना है। विदित हो कि रोहतास किला पर रोपवे के निर्माण की मांग लंबे अरसे से स्थानीय लोगों व जनप्रतिनिधियों द्वारा की जा रही थी।

लेकिन किला के निचले भाग में वन विभाग की भूमि होने से चाहकर भी जिला प्रशासन इसमें कुछ विशेष करने में सफल नहीं हो पा रही थी। लेकिन अब वन विभाग ने भूमि देकर इस अड़चन को भी खत्म कर दिया है। अब वन विभाग ने जिला प्रशासन को 1.33 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध करा दी है। जिससे किला तक पहुंचने के लिए रोपवे का निर्माण संभव हो सकेगा।

रोहतासगढ़ किला परिसर

मालूम हो कि 2015 में पर्यटन विभाग को रोप-वे व अतिथि गृह निर्माण के लिए 12 करोड़ 65 लाख की राशि आवंटित की गई थी। रोहतास किला में पहुंचने का अभी तक कोई सुगम मार्ग नहीं था। जंगलों के रास्ते पहाड़ होते हुए ही वहां तक पहुंचने का मार्ग था। जहां मुख्यमंत्री समेत हाल ही में राज्यपाल ने भी इसका दौरा हवाई मार्ग से पहुंच कर किया था।

रोहतासगढ़ किला

ज्ञात हो कि पर्यटनस्थल के विकास से रोहतास व नौहट्‌टा के पहाड़ी प्रखंडों के लोगों को विशेष लाभ होगा। रोपवे निर्माण से ना सिर्फ सरकार के राजस्व का साधन बढ़ेगा, बल्कि पर्यटन केंद्र से लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।

गौरवशाली है रोहतासगढ़ किला: रोहतासगढ़ किला देश के प्राचीन दुर्गों में से एक है। रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम से 55 किमी दूरी पर सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित है। समुद्र तल से 1500 मीटर ऊंचा है। प्राचीन और मजबूत किले का निर्माण त्रेतायुग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। मध्यकाल में यह मुगलों के अधिकार में चला गया। मानसिंह ने किले का विस्तार किया। स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई (1857) के समय अमर सिंह ने यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संचालन किया था। रोहतासगढ़ का किला काफी भव्य है। किले का घेरा 45 किमी तक फैला हुआ है। 83 दरवाजे हैं, जिनमें मुख्य चार- घोड़ाघाट, राजघाट, कठौतियाघाट व मेढ़ाघाट हैं। प्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, दरवाजों के बुर्ज, दीवारों पर पेंटिंग अद्भुत है। रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, रानी का झरोखा, मानसिंह की कचहरी आज भी मौजूद हैं।

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