आस्था: ताराचंडी धाम में बढ़ रही अखंड दीपों की संख्या

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बिहार के ऐतिहासिक शहर सासाराम शहर से दक्षिण में कैमूर पहाड़ी की मनोरम वादियों में मां ताराचंडी का वास है। कैमूर पहाड़ी की गुफा में अवस्थित जगत जननी मां ताराचंडी देवी एक सिद्ध शक्तिपीठ है। मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है। मान्यताओं के अनुसार सती का दायां नेत्र इस स्थान पर गिरा था। नेत्र गिरने के कारण ही इस धार्मिक स्थल का नाम मां ताराचंडी धाम विख्यात हुआ। मां ताराचंडी मंदिर में अवस्थित मां तारा व सूर्य की प्रतिमा तथा बाहर रखी अग्नि, गणेश व अर्घ्य सहित शिवलिंग की खंडित प्रतिमाएं इस स्थान की प्राचीनता के द्योतक हैं।

वही माँ ताराचंडी धाम में पहले शारदीय नवरात्र के दौरान दो-चार अखंड दीप जलते थे। लेकिन आज इसकी संख्या हजारों में पहुँच गई है। शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र में ताराचंडी धाम पर अखंड दीप जलाने के लिए दूसरे प्रदेशों से भी लोग पहुँच रहे है। पहले मंदिर के अंदर अखंड दीप जलता था। लेकिन अब दीपों की संख्या इतनी हो गई है कि ताराचंडी कमेटी ने अलग से एक दीप घर का निर्माण कर दिया है। धाम में अखंड दीप की संख्या हर वर्ष बढ़ रही है। नवरात्र में तो 10-15 क्विंटल घी की खपत अखंड दीप में होती है। इसे आस्था में अटूट कहें या मन्नते पूरी होने की उम्मीद। अखंड दीप जलाने वाले भक्त इसे आस्था में अटूट विश्वास बताते हैं। भक्त बताते है कि मां के दरबार मे कोई खाली हाथ नही लौटता।

सदियों से ख्याति रही है इस सिद्ध पीठ की देवी प्रतिमा के बगल में बारहवीं सदी के खरवार वंशी राजा महानायक प्रतापधवल देव का एक शिलालेख भी है। जो 212 सेमी लंबा व 38 सेमी चौड़ा है। शिलालेख विक्रम संवत 1225, ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि यानी बुधवार, 16 अप्रैल 1169 का है। जिससे यह प्रतीत होता है कि यह शक्तिपीठ उस जमाने में भी ख्याति प्राप्त कर चुका था। गौतम बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां रूके थे। वहीं सिखों ने नौंवे गुरु तेगबहादुर जी भी यहां आकर रुके थे। अब शारदीय व बासंतिक नवरात्र में यहां दुर्गा सप्तशती पाठ करने वाले भक्तों की काफी भीड़ रहती है।