बचपन से सबको हंसाया, आज सासाराम को रुला कर चले गए ‘कवि कुमार आजाद’

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डेढ़ दशक पूर्व तक सासाराम की गलियों और चौराहों पर मटरगश्ती करते दिखने वाला युवक कवि कुमार आजाद एक दिन टीवी चैनल और सुनहले पर्दे पर सुर्खियां बटोर लेगा, शायद ही यहां के लोगों ने सोचा होगा. टीवी के लोकप्रिय धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में हाथी की भूमिका से प्रसिद्धि पाए डॉ. हंसराज हाथी के सोमवार को मुंबई में हुई असामयिक निधन की खबर फैलते ही सासाराम के लोगों के मुंह से अचानक निकले शब्द, ईहे कविया हो… जिसने भी सुना थोड़ी देर के लिए अपने अतीत में चला गया.

देश के बंटवारे के वक्त सिंध प्रांत छोड़ कर शरणार्थी के रूप में सासाराम आए दो दर्जन परिवारों मे शामिल भरत सिंधी आजाद के पिता भी एक थे. उस जमाने में रेलवे स्टेशन से उत्तर खाली जमीन पर उन परिवारों का बसेरा बना. बाद में गौरक्षणी मुहल्ले का वह इलाका पंजाबी मुहल्ला के रूप में प्रसिद्धि पाया.

उसी मुहल्ले के निवासी रहे भरत बादवानी के दो पुत्रों में छोटा कवि और बड़ा रवि थे. पम्मी नामक एक बहन भी थी. भरत जी ने उसी इलाके में मयूर ब्रेड के नाम से एक छोटा कारखाना खोला. जो चल नहीं पाया. सामान्य माली हालत के बीच कवि का स्थानीय संत जेवियर स्कूल में नाम लिखाया गया. बचपन में ही समान्य से अधिक मोटा होने से कवि की एक अलग पहचान बन गयी. राह चलते वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया. स्कूल की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा में घर की माली हालत आड़े आयी. परिवार का एक समय व्यवसाय पूरी तरह चौपट हो जाने के बाद जीवन में आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़ी, फिर भी उनका धैर्य नहीं टूटा.

बचपन से लेकर युवावस्था की शुरुआत तक सासाराम में रहे कवि आजाद की यादें आज भी यहां के लोगों के मानस पटल पर विराजमान है. कवि के संग कुछ समय तक रहने वाले अमित कुमार पाठेला ने बताया कि उसके मोटापा को लेकर अकसर साथी या और लोग उसे तब के फिल्मी कलाकार महमूद या टूनटून जैसे ताने दिया करते थे. पर कवि पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था. वह उसी तरह सबों को हंसाते रहता था.

भरत आजाद के परिवार से काफी करीब रहे तेतरी गांव के निर्मल दुबे ने कवि के असामयिक निधन से भाव विह्वल दिखे. कहा बचपन से ही उसमें लोगों को हंसाने की कला थी. ऊपर से भगवान ने उसे मोटापा दे दिया था. हंसी का पात्र बना रहने वाले कवि के लिए मोटापा ही उसके कैरियर के लिए वरदान बन गया. 2003 में उस परिवार ने सासाराम छोड़ दिया. उसके बाद कवि ने कुछ करने की ठानी और उसे मुंबई में ठौर मिल गया. उसने बचपन से ही लोगों को हसाने का काम किया और आज वह इस शहर के लोगों को रुला कर चला गया.

अखिलेश कुमार कहते है कि, हम जब कभी बाजार जाते थे और कवि पर कभी नजर पड़ता था तो उस समय शहर के सबसे मोटे युवक को देखने के लिए रूक जाया करते थे. वे बताते है कि, उस समय सासाराम के रेलवे मैदान में क्रिकेट खेलते वक्त कुछ बच्चे कवि को खोदकर खूब चिढ़ाते थे, लेकिन कवि कभी गुस्सा नहीं करता. उसके जाने का हम सबों को बहुत दुख रहेगा. स्कूल के दिनों को याद करते हुए प्रदीप सिंह कहते है कि, वह अपने बेंच पर अकेला ही बैठता था.अगर कभी अमित और कवि बैठ जाते तो वो बेंच टुट जाता था.

बता दें कि, कवि कुमार आजाद बॉलीवुड में भी हाथ आजमा चुके थे. फिल्म जगत के मशहूर अभिनेता आमिर खान के साथ फिल्म मेला और सलमान खान के साथ भी एक पिक्चर में काम कर चुके थे. इसके अलावा टीवी सीरियल योद्धा अकबर में भी अभिनय किया था. हालांकि कवि को असली पहचान ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ से मिली.

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