त्रेतायुगीन माना जाता है रोहतासगढ़ का रोहितेश्वर शिव मंदिर, अपने आप में है रहस्य का खजाना

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रोहितेश्वर मंदिर, फोटो- आशीष कौशिक

जनश्रुतियों के अनुसार रोहतासगढ़ किला के मुख्य महल से दो मील पूरब में रोहतास पहाड़ी के पूर्वी छोड़ तथा उसके शीर्ष पर स्थित रोहितेश्वर शिव मंदिर की स्थापना त्रेता युग के दौरान की गई थी. फिलहाल इस बिन्दु पर मतभेद है. लेकिन यहां पहुंचकर स्थाप्य कला के साथ-साथ अन्य प्रमाणों का अध्ययन यह साबित करते हैं कि रोहतासगढ़ पहाड़ी के उपर पश्चिमाभिमुखी 28 फीट के लंबे-चौड़े आधारशीला पर बना यह मंदिर अपने आप में रहस्य का खजाना है.

इस पहाड़ी से संबंध रखने वाली खरवार, मुंडा, संथाल, जातियां पूरे किले क्षेत्र को रूईदासगढ़ का नाम देती है. जो बाद में अपभ्रंशित होते हुए रोहिताश्व तक पहुंचा. खरवार जनजाति तो अपने को रोहिताश्व का वंशज ही कहते हैं. जिनका मानना है कि राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व ने एक आदिवासी कन्या से विवाह रचाने के बाद यही प्रवास किया. तब इस मंदिर की स्थापना हुई.

चौरासन मंदिर

वैसे तो 84 सीढ़ियों के माध्यम से इस मंदिर तक पहुंचने की यथार्थ कहावत के कारण इसे चौरासन मंदिर का नाम दिया गया है. वहीं इसे रोहितासन मंदिर भी कहा जाता है. सावन महीने में शिवभक्तों के लिए आकर्षण के केन्द्र रहे इस मंदिर में शिवभक्त बांदू के दशाशीष नाथ शिव स्थान से सोन नद का जल लाकर जलाभिषेक करते हैं.

रोहितेश्वर मंदिर के गर्भ में शिवलिंग

यहां बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के अलावे नेपाल के शिवभक्त पहुँचते है. जो प्रतिवर्ष कांवर लेकर यहां पहुंचते हैं और अपनी मन्नत पूरी होने की कामना करते हैं.

यहां मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है तो वहीं ऊपर मध्य में शिवलिंग जैसा प्रतिमा है. उसके दोनों ओर दो हंस समपर्ण की मुद्रा में हैं. मंदिर के बाहर नंदी है. वहीं मंदिर के नीचे मां पार्वती का मंदिर है.

रोहितेश्वर मंदिर, फोटो- आशीष कौशिक

इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने बताया कि यहां से शशांक देव की मुहर का साँचा मिला था. जिससे 625 ई. में बंगाल के राजा शैव भक्त शशांक देव गौड़ द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराने का प्रमाण मिलता है.

रोहितेश्वर मंदिर के नीचे स्थित देवी मंदिर

मंदिर निर्माण नागर शैली में होने के कारण इसके 7वीं सदी में मरम्मती की प्रमाणिकता सिद्ध होती है. वर्तमान स्थिति मंदिर रोहतासगढ़ किले की परिधि में होने के कारण पुरातत्व विभाग के अधीन है. परंतु विभाग द्वारा मंदिर व आसपास किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं किया गया है. 

काशी प्रसाद जयसवाल शोध संस्थानसे जुड़े जिले के इतिहासकार डॉ. श्याम सुन्दर तिवारी के मुताबिक इस मंदिर की बनावट: रोहतासन मंदिर एक ऊँचे आधार पर स्थित है, जिसपर दो वेदिकाएँ बनती हैं. पश्चिमी निचली वेदिका बड़ी है, जबकि पूर्वी वेदिका उससे छोटी तथा ऊँची है. इसी वेदिका पर पश्चिमाभिमुख मंदिर अवस्थित है. वेदिकाओं पर जाने के लिए पश्चिम में एक सोपान है, जिसमें 84 सीढ़ियाँ बनी हैं, जो 8-8 इंच ऊँची हैं. प्रत्येक दसवीं सीढ़ी एक छोटी वेदिका बनाती है. इस सोपान क्रम के दोनों ओर कगार बने हैं. मंदिर 28 फीट लंबे-चौड़े आधार पर बना है.

गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है. गर्भगृह के बाहर दो भित्ति स्तंभों के ऊपर छोटा सा मंडप है. मंडप के भीतर मंदिर के दरवाजे को फूलों से अलकृत किया गया है. ऊपर मध्य में शिवलिंग जैसी छोटी प्रतिमा है. इसके दोनों ओर दो जोड़ा हंस बने हैं, जो अपनी चोंच में कमल की कली लिए हुए है और गणेश को समर्पण की मुद्रा में हैं. नीचे दरवाजे के अगल-बगल द्वारपाल बने हुए हैं, जिन्हें अपने खंजरों को खींचते हुए प्रदर्शित किया गया है. हालांकि गर्भगृह के भीतर विशेष नक्काशी नहीं है, किंतु मंदिर का बाहरी भाग बहुत ही भव्य, आकर्षक और सुंदर है.

किला पर जाने का रास्ता

मंदिर के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है. नंदी मंदिर के सामने यानी पश्चिम की ओर है. मंदिर की छत सपाट है तथा बाद की बनी हुई है. स्पष्ट लगता है कि मंदिर के ऊपर शिखर रहा होगा जो अब नहीं है. कहा जाता है कि इस मंदिर में रोहिताश्व द्वारा पूजा अर्चना की जाती रही, लेकिन यह मंदिर इतना प्राचीन नहीं लगता.

एक बात ध्यान देने योग्य है कि रोहतासगढ़ पर बंगाल के शासक शशांक देव का शासन रहा, जो कट्टर शैव था. हो सकता है कि उसी के समय में इस मंदिर की स्थापना हुई हो. नागर शैली के इस मंदिर की वास्तुकला भी पूर्वमध्ययुगीन है. इसपर आदिवासी कला की भी छाप है. इस मंदिर का निर्माण शशांक देव के बाद किसी खरवार राजा द्वारा हुआ है. बाद में इसकी मरम्मती राजा मान सिंह द्वारा कराई गई.

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