जिउतिया: संतान की लंबी उम्र के लिए 24 घंटे की निर्जला व्रत और चिल्हो-सियारो के कथा

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पूर्वांचल और बिहार के ज्यादातर इलाकों में जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) मनाया जाता है. इस पर्व में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं. थोड़े समय पूर्व तक यह उपवास सिर्फ पुत्रों के लिए किया जाता था. लेकिन अब, यानि आजादी के बाद के सालों को देखिएगा तो अपने आप ही भारत का बहुसंख्यक समुदाय इस व्रत को पुत्रियों के लिए भी मनाने लगा है. इस पर्व में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जो बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है. जिसे अपनी संतान की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है.

हिन्दू पंचांग के अनुसार जिउतिया व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता है. छठ की भांति यह व्रत भी तीन दिनों तक चलता है, जिसमे पहले दिन नहाय-खाय, दुसरे दिन निर्जला व्रत और तीसरे दिन व्रत का पारण होता है. इस पर्व का मुख्य दिन अष्टमी का दिन होता है. जिस दिन निर्जला व्रत रखा जाता है. इससे एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को नहाय-खाय होता है. जबकि अष्टमी के अगले दिन नवमी तिथि को जितिया व्रत का पारण किया जाता है. व्रत का पहला दिन जिउतिया व्रत के पहले दिन को नहाई खाई कहा जाता है, इस दिन महिलाएं प्रातः काल जल्दी जागकर पूजा पाठ करती है और एक बार भोजन करती है. भोजन में बिना नमक या लहसुन आदि के सतपुतिया (तरोई) की सब्जी, मंडुआ के आटे के रोटी, नोनी का साग, कंदा की सब्जी और खीरा खाने का महत्व है. ठेकुआ और पुआ भी बनता है. उसके बाद महिलाएं दिन भर कुछ भी नहीं खातीं.

नोनी

जिउतिया व्रत का दूसरे दिन को खुर जिउतिया कहा जाता है. यह जिउतिया व्रत का मुख्य दिन होता है. इस पुरे दिन महिलाएं जल ग्रहण नहीं करती और निर्जला उपवास रखती है. व्रत का तीसरा दिन यह व्रत का आखिरी दिन होता है. इस दिन व्रत का पारण किया जाता है. वैसे तो इस दिन सभी सामान्या खाना खा सकते है, लेकिन मुख्य रूप से झोर भात, नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी सबसे पहले भोजन के रूप में ली जाती है.

पूजन की विधि: पूजन के लिए जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित किया जाता है और फिर पूजा करती है. इसके साथ ही मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाई जाती है. जिसके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है. पूजन समाप्त होने के बाद जिउतिया व्रत की कथा सुनी जाती है. पुत्र की लंबी आयु, आरोग्य तथा कल्याण की कामना से स्त्रियां इस व्रत को करती है. कहते है जो महिलाएं पुरे विधि-विधान से निष्ठापूर्वक कथा सुनकर ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देती है, उन्हें पुत्र सुख व उनकी समृद्धि प्राप्त होती है.

फाइल: जिउतिया की कठा सुनती व्रती

लोक की रूढ़ परम्परा के अनुसार ही इस व्रत की महात्म्य कथा है. चील और सियारन (चील्हो-सियारो) की. चील्हो-सियारो सखियाँ थीं. विशाल बरगद के ऊपर चील का घोंसला था और जड़ की माँद में सियारन रहती थी. एक दिन चील को व्रत की तैयारी करते देख सियारन ने भी व्रत रखने की ठानी. चील ने मना किया कि यह व्रत बहुत ही संयम नियम का है और तुम्हारी कच्छ भच्छ की प्रवृत्ति के कारण निर्वाह नहीं हो पायेगा लेकिन सियारन न मानी और उसने भी निर्जला व्रत रख लिया. दिन तो किसी तरह बीत गया लेकिन रात को उसे भूख सहन नहीं हुई. पास के गाँव से एक मेमने को ला कर खाने लगी. उसके चबाने का स्वर चील को सुनाई दिया तो उसने ऊपर से ही कहा – कर दिया न सत्यानाश! भूख नहीं सही गई तो इस समय हाड़ चबा रही हो? सियारन ने उत्तर दिया – नहीं सखी! मारे भूख के मेरी हड्डियाँ ही कड़कड़ा रही हैं. चील ने नीचे आकर सब देख लिया और सियारन को धिक्कारती उड़ गई. उस जन्म में सियारन की जितनी भी संतानें हुईं, उसके इस पाप के कारण असमय ही मरती गईं जब कि चील की वंशवरी बढ़ती गई. अगले जनम में दोनों मनुष्य हुईं. पूर्व सियारन का विवाह राजा से हुआ और चील का मंत्री से. पूर्वजन्म के पाप के कारण रानी की संतानें एक कर एक मरती गईं जब कि मंत्री के सात पुत्र हुये. मारे जलन के रानी ने सातों पुत्रों को मरवा कर उनकी देह फिंकवा दी और उनके सिर टोकरियों में बन्द करा मंत्री के यहाँ भिजवा दिये. जब टोकरियाँ खोली गईं तो सभी सोने और जवाहरात से भरी थीं. उसी समय मंत्री के सभी पुत्र भी अपने अपने घोड़ों पर सवार आ गये. रानी ने सुना तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ. वह स्वयं मंत्री के यहाँ गई और उसकी पत्नी से पूछा. पूर्वजन्म के तप के कारण मंत्री की स्त्री को सब याद था, उसने सारी कथा सुनाई और रानी को जिउतिया व्रत रखने को कहा. रानी ने संयम नियम के साथ व्रत रखा और उसके पुण्य स्वरूप उसे कई पुत्र हुये.

पुराण कथा: नागवंश गरुड़ से त्रस्त था. वंश की रक्षा के लिए उन्हों ने गरुड़ से एक समझौता किया कि प्रतिदिन उसे एक नाग खाने को देंगे जिसके बदले गरुड़ नागों का उच्छृंखल आखेट नहीं करेंगे. समझौते के अनुसार व्यवस्था हो गई लेकिन प्रतिदिन किसी न किसी नाग घर में रोना पिटना मचता क्यों कि उस घर से एक पुत्र गरुड़ का आहार बनने को जा रहा होता. उसी काल में गन्धर्वराज जीमूतवाहन हुये. वे बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे. युवाकाल में ही राजपाट छोड़ वन को प्रस्थान किये. वन में उन्हें रोती हुई नागमाता मिली जिसका पुत्र शंखचूड़ अगले दिन गरुड़ के आहार के लिये भेजा जाने वाला था. दयालु जीमूतवाहन ने स्वयं को प्रस्तुत किया. वे लाल कपड़ा लपेट उस शिला पर लेट गये जिस पर से गरुड़ अपना आहार उठाता था. गरुड़ आया और उन्हें लेकर उड़ चला. उसे आश्चर्य हुआ कि वह नाग मृत्यु के भय से चिल्लाने रोने के बजाय एकदम शांत था. जब गरुड़ ने कपड़ा हटाने पर नाग के स्थान पर जीमूतवाहन को पाया तो कारण पूछा. उन्हों ने सब सच सच बता दिया. गरुड़ ने प्रभावित हो कर उन्हें छोड़ दिया और नागों को अभय आश्वासन दिया. तब से ही यह व्रत प्रारम्भ हुआ.

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