…आखिर शेरशाह ने पांच साल में कैसे बदल दी सासाराम की तस्वीर

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यह सासाराम है, पहले इसे सहसराम के नाम से जाना जाता था। किंवदंतियां हैं कि यहां सहस्त्रबाहू और परशुराम के बीच युद्ध हुआ था। बाद में संधि हुई, जिसमें सहस्त्रबाहू व परशुराम के नाम को मिलाकर सहसराम नामकरण हुआ। रोहतास गढ़ किला को आज भी आदिवासी हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व का किला मान उसे अपने पूर्वज की धरोहर मानते हैं। रोहतासगढ़ तीर्थ महोत्सव में वे एक साथ जुट अपनी परंपरा व पूर्वजों की मिट्टी को नमन करते हैं। इतिहास के पन्ने पलटते जाते हैं। दस्तावेजों का दौर शुरू होता है। सहसराम की धरती में पला बढ़ा फरीद (शेरशाह) 1540 में हुमायुं को हरा भारत का बादशाह बन बैठा व 1545 तक दिल्ली की गद्दी पर शासन किया।

शेरशाह का केन्द्रीय प्रशासन अत्यंत मजबूत व विकासपरक था। महज पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नई नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की। उसी ने पहला रुपया जारी किया, जो आजतक यहां की मुद्रा को रुपया के नाम से जानते हैं। डाक व्यवस्था को पुन: संगठित किया और काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगांव तक ग्रांड ट्रंक रोड को बनवाया। उसकी न्याय व्यवस्था ऐसी कि एक वृद्धा रात में आभूषण व स्वर्ण मुद्राओं से भरा सोने का घड़ा लेकर अकेली भी चली जाए तो चोरों की हिम्मत नहीं कि उसके पास फटक जाएं। सासाराम में पहले अपने पिता हसन खां के रौजा निर्माण का कार्य पूर्ण करा पुन: अपना रौजा का निर्माण कार्य शुरू कराया। पानी के बीचोबीच स्थित यह रौजा पठान स्थापत्य कला का अदभुत नमूना है। शेरशाह महज पांच साल के शासन काल में ही देश के लिए नजीर बन गए। पानी से भरे तालाब के बीचोबीच उसके रौजा को इतिहासकार ताजमहल से भी खुबसूरत बताते नहीं थकते। यह शेरशाह जैसे शासक का ही काम था कि डाक से ले सड़क, राजस्व, न्याय के क्षेत्र में काम कर उन सभी जन प्रतिनिधियों को आइना दिखाया कि मौका मिला है तो जनता के लिए काम से मत भागिए। यही जनार्दन है। यही सत्ता के तख्त पर विराज कराती है। नजरें फेर ली तो फर्श का फासला भी दूर नहीं।

सासाराम स्थित शेरशाह का मकबरा

देश का पहले आम चुनाव 1952 से लेकर अबतक यहां की जनता ने चार लोगों को अपना प्रतिनिधि चुना है। जिसमें सर्वाधिक जगजीवन राम आठ बार यहां के प्रतिनिधित्व किए। दो बार उनकी बेटी मीरा कुमार, तीन-तीन बार पूर्व आइएएस मुनिलाल तथा छेदी पासवान प्रतिनिधित्व किए हैं। जिसमें छेदी को छोड़ सभी के सिर पर केंद्रीय मंत्री का ताज भी चढ़ा है। बुजुर्ग बताते हैं कि बाबू जगजीवन राम तब पीएम के बाद सबसे कद्दावर नेता थे। उप प्रधानमंत्री की कुर्सी तक हासिल किए थे। रेल, संचार, कृषि, रक्षा कोई ऐसा महत्वपूर्ण मंत्रलय नहीं जिसका नेतृत्व वे नहीं किए हों। लोग अपने प्रतिनिधि की राजनीतिक ऊंचाई को देख इतराते रहे, लेकिन इलाका मायूस था। संसदीय क्षेत्र में कोई ऐसी राष्ट्रीय स्तर की चीज नहीं जिससे इलाका इठलाए। अपने भाग्य को सराहे कि मेरा प्रतिनिधि शीर्ष पर है। यहां के किसान न चाहते हुए भी आज भी उस अंग्रेज इंजीनियर के प्रति कृतज्ञ हैं, जो यहां सोन नहर प्रणाली शुरू करा पेट भर भोजन का उपाय कर गए थे।

सोन नहर प्रणाली के तहत अंगेजो द्वारा बनाया हुआ पुरानी एनिकट डैम

जगजीवन राम ने 1977 में दुर्गावती जलाशय परियोजना का शिलान्यास किया था। तब लोगों को लगा था कि असिंचित क्षेत्रों के खेतों में फसल लहलहाएगी। निर्माण कार्य का हश्र ऐसा कि 37 वर्षों बाद 2014 में उद्घाटन तो हुआ, लेकिन कई गांवों के खेत नहर व वितरणियों के अभाव में आज भी सूखे हैं। फसल लहलहाने का इंतजार करते एक पीढ़ी चली गई। मतदाता कहते हैं कि एक शेरशाह का न्याय था, जिसके समय कम संसाधन में भी विकास के मायने दिखते थे। शेरशाह की बनाई गई ग्रैंड ट्रंक सड़क का वजूद कायम है। अब तो सांसद निधि की सड़कें एक कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाती। सासाराम में लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में 19 मई को होना है। एक तरफ मीरा कुमार जो यहां से दो बार राष्ट्रपति चुनाव में महागठबंधन की उम्मीदवार भी रही हैं, तो दूसरी ओर भाजपा ने खिलाड़ी से राजनीतिज्ञ बने छेदी पासवान को फिर मौका दिया है।

रोहतास-कैमूर सीमा पर स्थित दुर्गावती जलाशय परियोजना

चुनाव में जनता सवाल लेकर बैठी है। उन्हें न तो अबतक राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली जाने का अवसर मिल पाया है, न हवाई अड्डा देखने का। रोहतास उद्योग समूह पहले ही बंद हो गया। पीपीसीएल में भी ताले लटक गए। चुनाव मैदान के सभी बांकुड़ों के सामने सवाल यह अहम सवाल है, मतदाताओं को सवाल पूछना उसका अधिकार भी है। आखिर इन्हीं सवालों का जवाब पाने के लिए जनता कड़ी धूप में घंटों कतार में लग लोकतंत्र के महापर्व में भागीदार बनती है। जनता के सवालों का जवाब देना माननीयों का धर्म भी है, तभी हमारा लोकतंत्र और सशक्त होगा।

साभार- दैनिक जागरण


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